
रात के ढाई बज चुके थे। पूरे कारुसो विला पर एक भारी, दम घोंटने वाला सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर की बर्फीली हवाएँ बेसमेंट की छोटी सी वेंटिलेटर खिड़की से टकराकर एक साए की तरह सरसरा रही थीं। कमरे की एकमात्र डिम पीली लाइट भी अब बंद थी, और पूरा कमरा केवल खिड़की से छनकर आती चाँद की मटमैली, सफ़ेद रोशनी से नहाया हुआ था।
लियो बेड पर लेटा हुआ था। दवाओं और बुख़ार के असर से उसका शरीर भारी था, लेकिन उसकी बाईं बाँह का दर्द अब एक धीमी, सुलगती हुई कसक बन चुका था। उसकी शर्ट के ऊपर के कुछ बटन खुले थे ताकि उसकी ज़ख़्मी बाँह की पट्टी पर दबाव न पड़े। वह गहरी और अशांत नींद के बीच करवटें बदल रहा था, उसके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। उसके सपनों में अभी भी वही ख़ून, गोलियों की आवाज़ और नीरो की वो ज़हरीली, डार्क नज़दीकियां घूम रही थीं।

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