
बेसमेंट के उस बंद कमरे में दवाओं की तीखी गंध और हवा में तैरती नमी लियो के ज़हन पर हावी हो रही थी। रात का एक बज चुका था। बाहर की दुनिया में शिकागो की गगनचुंबी इमारतें लाइटों से जगमगा रही होंगी, लेकिन इस पाताल जैसे तहखाने में सिर्फ एक डिम पीली लाइट जल रही थी, जो दीवार पर लियो के थके हुए जिस्म की लंबी, डरावनी परछाईं बना रही थी।
लियो बेड पर लेटा हुआ था। उसकी बाईं बाँह पर बंधी सफ़ेद पट्टी अब पूरी तरह सूख चुकी थी, लेकिन अंदर का ज़ख़्म रुक-रुक कर एक तेज़ कसक दे रहा था। हर बार जब वह करवट बदलने की कोशिश करता, उसके सीने और कंधे की नसें खिंच जातीं और उसके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल जाती।

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